शरीर के चक्र और उनका महत्व

मणिपुर चक्र

नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का ये चक्र शरीर में मणिपुरनमक ये तीसरा चक्र है. जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहाँ एकत्र हैं उसे काम करने की धुन सी लगी रहती है. ऐसे लोगो को कर्मयोगी कहते हैं. ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं.

मन्त्र: ‘

कैसे जाग्रत करें

अपने कार्य को सकारात्मक अयं देने के लिए इस चक्र पर ध्यान करें. पेट से स्वास लें.

प्रभाव

इसको सक्रिय करने के लिए तृष्णा, इर्षा, लज्जा, चुगली, भय, मोह, घृणा अदि को दूर करें।

एहि चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना ज़रूरी हैं। आत्मवान होने के लिए ये अनुभव करना ज़रूरी है। आत्मबल, आत्मशक्ति, और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य ज़रूरी नहीं।

अनाहत चक्र

हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दाल कमल की पंखुरियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरो से सुशोभित चक्र ही अनाहत चक्रहै। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत से सक्रिय है, तो आप एक शरजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं।

मंत्र: ‘

कैसे जाग्रत करें

हृदय पर संयम रखें से कर धयान लगाने से ये चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को साणे से पूर्व इस चक्र का ध्यान करें। इस अभ्यास से ये चक्र जाग्रत होने लगता है और सुषुम्नाइस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगता है।

प्रभाव

इसके सक्रिय होने पर कपट, लिप्सा, कुतर्क, हिंसा, मोह, चिंता, अविवेक, दम्भ, और अहंकार समाप्त हो जाते हैं।

इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और समंवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वतः ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत हितेषी और बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी और सर्वप्रिय बन जाता है।

विशुद्ध चक्र

कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहाँ विशुद्धिचक्र है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है, तो आप अति शक्तिशाली होंगे।

मंत्र: ‘

कैसे जाग्रत करें

कंठ में सयम और धयान लगनी से एहि चक्र जाग्रत होने लगता है।

प्रभाव

इसके जाग्रत होने पर सोलह कालयों और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत होने से जहाँ भूक और प्यास को रोका जा सकता है वहीँ मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।

आज्ञाचक्र

भ्रूमध्य (दोनों आँखों के बिच भृकुटि में) में आज्ञा चक्रहै। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहाँ ज़्यादा सक्रिय है, वह व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, तेज़ दिमाग और संवेदनशील हो जाता है लेकिन वो सब कुछ जानने का बाद भी मौन रहता है। इसे बौद्धिक सिद्धिकहते है।

मंत्र: ‘

भृकुटि के मध्य ध्यान लगते हुए साक्षी भाव में रहने से ये चक्र जागृत होने लगता है।

प्रभाव

यहाँ अपर शक्तियां और सिद्धयाँ निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्रके जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पार्टी हैं, व्यक्ति एक सिद्ध पुरुष बन जाता है।

सहस्त्रार चक्र

सहस्त्रारकी स्तिथि मस्तिष्क के मध्य भाग में है, अर्थात जहाँ चोटी रहती है। यदि व्यक्ति याम, नियम का पालन करते हुए यहाँ तक पहुँच गया है तो वह अनादमय स्तिथि में आजाता है।

ऐसे व्यक्ति को सन्यास, संसार और सिद्धियां से कोई मतलब नहीं रहता है।

कैसे जाग्रत करें

मूलाधारसे होते हुए ही सहस्त्रारतक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह चक्रजाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।

प्रभाव

शरीर सरंचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विधुतियाँ और जैवियन विद्युत का संग्रह है। ये ही मोक्षका द्वार है।

समाप्त

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