महापुण्य दायक है उत्पन्ना एकादशी व्रत

मार्गशीर्ष मॉस कृष्णा पक्ष की एकादशी तिथि का शाश्त्रो में बड़ा महत्व है। पुराणों में सभी व्रतों में एकादशी व्रत का बड़ा महत्व बताया गया है।

पुरे साल में २४ एकादशी आती हैं इनमें देवशयनी, देवप्रबोधनी और मार्गशीर्ष मास की कृष्णा पक्ष की एकादशी तिथि का बड़ा महत्व है।

इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम सी भी जाना जाता है।

यह एकादशी व्रत इस बार १४ नवंबर को पारी थी। ऐसा मन जा है की इस दिन से एकादशी व्रत की शुरुआत हुई थी।

क्योंकि सतयुग में इस एकादशी तिथि को भगवन विष्णु के शरीर से एक देवी का जन्म हुआ था।

इस देवी ने भगवन विष्णु के प्राण बचाये जिससे प्रसन्न होकर विष्णु ने इन्हे एकादशी नाम दिया।

यह व्रत पूर्ण नियम, श्रद्धा व् विश्वास के साथ रखा जाता है, इस व्रत के प्रभाव स्वरूप धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पूजन विधि

एकादशी के दिन ब्रह्म महूरत में श्री हरी कृष्णा की पुष्प, जल, धुप, और अक्षत से पूजा की जाती है। इस व्रत में केवल फलाहार का ही भोग लगाया जाता है। निर्जल व्रत करने का आधा फल एक बार भोजन करने के बराबर होता है।

इस व्रत में शंख से जल नहीं पीना चाहिए। इस एकादशी व्रत का फल हज़ार यज्ञों से भी अधिक है। ये उपवास, उपवासक का मन निर्मल करता है, शरीर को स्वस्थ रखता है, हृदय निर्मल करता है तथा भक्त को सद्मार्ग की औऱ प्रेरित करता है।

व्रत का पुण्य जीव का उद्धार करता है। एकादशी के व्रतों में उत्पन्ना एकादशी का एक प्रभुख स्थान है। इस दिन भगवन विष्णु जी की पूजा करने का विधान है।

उपवास में तामसिक वस्तुओं का सेवन करना निषेध माना जाता है। इन वस्तुओं में मास, मदिरा, प्याज़ औऱ मसूर दाल शामिल है।

कबीरदास जी के दोहे सुने:

ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए व्रत का संकल्प करना चाहिए। प्रातः काल सभी दैनिक कार्यों से निवृत होकर, स्नान करने के पश्चात, सूर्य देव को जलार्पण करके, भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए।

इसके बाद धुप, दीप, नवध से भगवान् का पूजन करना चाहिए। रात्रि के समय दीप दान करना चाहिए।

यह सत्कर्म भक्ति पूर्वक करना चाहिए। उस रात को नींद का त्याग करना चाहिए औऱ रात्रि में भजन सत्संग अदि करके भगवान का ध्यान करना चाहिए।

इस दिन श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मणो को दक्षिणा देनी चाहिए औऱ प्रभु से गलतियों की क्षमा मांगनी चाहिए। औऱ अगर संभव हो तो, इस मास में दोनों पक्षों की एकादशी के व्रतों को रखना चाहिए।

व्रत कथा

सतयुग में एक महा भयंकर दैत्य मोर हुआ करता था। दैत्य मोर ने इंद्रा अदि देवताओं पर विजय प्राप्त कर आहे, उनके स्थान से भगा दिया था। तब इंद्रा औऱ अन्य देवता क्षीर सागर भगवान श्री विष्णु जी के पास जाते हैं।

देवताओं ने श्री विष्णु भगवान जी से दैत्य के अत्याचारों से मुक्त होने के लिए प्रार्थना की। इन्द्र देव के वचन सुनकर भगवान श्री विष्णु बोले देवताओं मैं तुम्हारे शत्रुओं का शीघ्र ही संहार करूँगा।

जब दैत्यों ने भगवान् श्री विष्णु जी को युद्ध भूमि पर देखा तो उन पर अस्त्रशास्त्रों का प्रहार करने लगे। भगवान् श्री विष्णु, मोर दैत्य को मरने के लिए जिन जिन शास्त्रों का प्रयोग करते वे सभी उसके तेज से नष्ट होकर उस पर पुष्पों के सामान गिरने लगे।

भगवान् श्री विष्णु उस दैत्य के साथ कई वर्षो तक युद्ध करते रहे, परन्तु उस दैत्य को नहीं जीत सके। अंत में विष्णु जी शांत होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिएकाश्रम की एक लम्बी गुफा में विश्राम करने के लिए चले गए।

वो दैत्य भी उनके पीछे पीछे उस गुफा में आगया। उसे लगा की आज वो विष्णु भगवान को मार कर अपने सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेगा। तभी उस गुफा में एक अति सुन्दर कन्या उत्पन्न हुई औऱ दैत्य मूर के सामने आकर उससे युद्ध करने लगी।

दोनों में बहोत देर तक युद्ध चलता रहा। उस कन्या ने उसको धक्का मरकर मूर्छित कर दिया औऱ वह दैत्य मृत्यु को प्राप्त होगया।

उसी समय श्री विष्णु जी की निंद्रा टूटी तो उस दैत्य को किसने मारा उस पर विचार करने लगे। तभी उस कन्या ने बोलै की ये दैत्य आपको मारने के लिए आया था। तब मैंने आपके शरीर से उत्पन्न होकर इस दैत्य का संहार करा।

भगवान् विष्णु जी ने उस कन्या का नाम एकादशी रखा क्योंकि वह एकादशी के दिन श्री विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुई थी। इसी कारण इस दिन को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है।

शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखता है वह मोहमाया के प्रभाव से मुक्त होजाता है। छल कपट की भावना उसमें कम होजाती है।

अपने पुण्य कर्मो के प्रभाव से वो व्यक्ति विष्णु लोक में स्थान पाने योग्य होजाता है।

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