जब दक्ष प्रजापति ने शिव भगवान को रुष्ट किया

कई बार मनुष्य जिस योगयता के बल पर ऊँचा पद प्राप्त करता है, तब वह हकार वश स्वम को उस पद की गरिमा से भी ऊँचा समझने लगता है।

वह इस बात को भूल जाता है की जिन नियमो के करणव्य हेतु उसे जिस पद की प्रतिष्ठा प्राप्ति हुई है, वह केवल कर्तव्यपरावरण से ही जीवित रह सकती है।

ब्रह्मा जी ने अपने मानस पुत्र दक्ष को उसके वेद ज्ञान की विज्ञता से प्रभावित होकर उसे प्रजापति का प्रतिष्ठित पद प्रदान कर दिया।

एक समय उसके द्वारा एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया। उस यज्ञ में सभी देवता पधारे।

जब दक्ष ने यज्ञ भवन में प्रवेश किया तब उसके सम्मान में सभी देवगण खरे होगये लेकिन ब्रह्मा जी और भगवान शंकर जी बैठे रहे।

तब से दक्ष, भगवान शंकर जी से द्वेष करने लगा। भगवान शंकर जी ने दक्ष की पुत्री, सती से विवाह किया था। इस नाते दक्ष ये समझता था की दामाद होने के नाते भगवान शंकर जी को उसका सम्मान करना चाहिए।

दक्ष यह भूल गया था की ब्रह्मा जी ने ही अपने पुत्र दक्ष प्रजापति को आदिशक्ति की आराधना कर उन्हें पुत्री रूप में पाने हेतु परामर्श दिया था।

तब आदिशक्ति ने ही वर स्वरुप दक्ष को सती के रूप में उसके घर अवतरित होने का वर दिया था।

लेकिन दक्ष ने जब पुनः यज्ञ का आयोजन किया तो उसने अपनी पुत्री सती तथा भगवान शिव जी को निमंत्रण नहीं भेजा।

शंकर भगवान जी के समझने पर भी सती अपने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ में बिना बुलाये चली गयी।

तब दक्ष ने भगवान शिव का और सती का घोर अपमान किया।

तब सती ने स्वमं को योगाग्नि में भस्म कर लिया।

तब भगवान सिव की आज्ञा से वीरभद्र ने दक्ष प्रजापति का सिर काट डाला। बर्ह्मा जी की प्रार्थना से भगवान शिव ने दक्ष प्रजापति को बकरे का सिर लगाकर जीवनदान दिया।

आहंकारवश वेदो की मर्यादा भांग करने के फलस्वरूप दक्ष को यह दंड मिला।

सृष्टि के परया सञ्चालन हेतु ब्रह्मा जी ने प्रतिष्ठित पद प्राप्त कर दक्ष अहंकारी होगया और वह वेद मर्यादा को ही चुनौती देने लगा।

विम्भुं व्यापकं ब्रह्म वेद स्वरूपं

जिन भगवान शिव की कृपा से वेद मर्यादा सुरक्षित है, उन वेद स्वरुप साक्षात् परब्रह्म भगवान को यज्ञ में भाग लेने पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया।

जिसका परिरणाम दक्ष को भुगतना पड़ा।

सृष्टि निर्माण तथा उसके सञ्चालन हेतु सभी नियमो का ज्ञान हमारे ग्रंथो में है। उनकी अवहेलना से ही मनुष्य के जीवन में संकट बड़े हैं।

आधुनिक समय में भी मनुष्य का स्वाभाव कुछ ऐसा ही है, स्वमं नियमो का निर्माण करना और दुसरो से नियम पालन की आशा करना परन्तु स्वमं नियमो का उल्लंघन करना।

जिस वैदिक मर्यादा के निर्वाहान का कार्यभार दक्ष को मिला, उन ही शक्तियों का दक्ष ने दुरुपयोग किया।

जानिए :

पारवती की दया से टल जाते हैं शिवभक्तों के संकट

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समाज में सत्य एवं समानता का व्यवहार हो, मनुष्य के द्वारा अर्जित शक्तियां एवं ज्ञान, समाज के विनाश का कारण न बने।

इसके लिए कृपासिंधु भगवान समय समय पर विभिन रूपों में अवतार लेकर न केवल मानवीय समाज के लिए विनाश का कारण बानी उन शक्तियों का दमन करते हैं। इसके अलावा समाज के कल्याण के लिए उचित मार्दर्शन भी करते हैं।

मनुष्य को कभी भी यह विस्मरण नहीं होना चाहिए की सृष्टि सञ्चालन में उसका योगदान केवल आंशिक है।

सभी के परस्पर सहयोग, सहभागिता आपसी प्रेमभाव से ही समाज के कल्याण के सभी कार्य सम्पन होते हैं।

कोई एक व्यक्ति सम्पूर्ण कार्य के सम्पन होने का श्रेय नहीं ले सकता, ब्रह्मा जी ने समाज कल्याण के उद्देश्य से सनत्कुमार, सनातन, नारद जी तथा सप्त प्रह्म ऋषियों आदि समस्त अपने मानस पुत्रो को जगत के कल्याण के कार्य में नियुक्त किया।

कबीरदास जी के दोहे सुने:

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